वैज्ञानिकों ने खोज लिया हैं BYPASS ,stent से मुक्ति पाने का इलाज.इंडिया में भी हैं उपलब्ध!

natural bypass benefits in hindi,

what is the concept of natural bypass?

भगवान ने हमें हृदय में हजारों धमनियों को दिया है. तीन मुख्य कोरोनरी धमनियां पहले लगभग 10 शाखाएं शरू करती हैं, जो आगे 100 शाखाएं फिर सैकड़ों शाखाएं फिर हजारों शाखाएं में होती हैं. इन शाखाओं को Capillaries कहा जाता है. ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं.और एक दूसरे से रक्त दे सकती हैं. या प्राप्त कर सकती हैं.ये चैनल हृदय की मांसपेशियों में खून का अच्छा स्रोत हो सकती है. जब कुछ प्रमुख या छोटी धमनियां अवरुद्ध हो जाती हैं.

यदि, किसी तरह , ये चैनल खोले या विस्तृत किये जा सके.तो वंचित दिल की मांसपेशियों को पर्याप्त रक्त की आपूर्ति मिल सकती है. जिसे प्राकृतिक बायपास(natural bypass) कहा जा सकता है. वैज्ञानिक रूप से इस उपचार को “न्यूमेटिकली असिस्टेड नेचुरल बाईपास” या “पैन बाईपास” कहा जा सकता है.

ये प्राकृतिक चैनल खिलाडियों या एथलीटों में बहुत ज्यादा मौजूद होते हैं.क्योंकी वे अपने पूरे करियर में बहुत सारे व्यायाम करते हैं.जिससे हृदय की मांसपेशियों को इन ट्यूबों को व्यापक ट्यूबों में विकसित किया जा सकता है. एक बार जब इन ट्यूबों को विकसित किया जाता है, तो एथलीटों को एनजाइना का दर्द या बीमारी नहीं होती है, भले ही ब्लॉकेज 80-90% तक रुकावटें पैदा करें.ऐसे लोगो की हृदय की मांसपेशियां मर नहीं जाती हैं, भले ही वे 100% रुकावट से पीड़ित हों.

How to develop these Natural bypass Channels?

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इन प्राकृतिक बाईपास चैनलों को कैसे विकसित किया जाए?

हम एक एथलीट की तरह हृदय रोगी को चला तो नहीं सकते हैं. और न ही हम उन्हें गंभीर व्यायाम करने के लिए कह सकते हैं. क्योंकि थोड़ी सी भी परिश्रम के कारण उन्हें एनजाइना का दर्द हों जायगा.

लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई मशीन तैयार की है. जो इन समानांतर चैनल को विकसित कर सकते हैं. कोरोनरी धमनियों की जड़ में दबाव बढ़ने से कोरोनरी चैनलों में यह मशीन कृत्रिम रूप से रक्त प्रवाह को बढ़ा सकती है. इस मशीन के साथ एक घंटे का उपचार दिल की मांसपेशियों को अधिक रक्त की आपूर्ति करने वाली इस समानांतर धमनी / केशिका प्रणाली को खोलना शुरू कर सकता है.

दूसरा प्राकृतिक चैनल पूरी तरह से विकसित करने के लिए लगभग 30 सत्रों के लिए यह उपचार जारी रखा जाना चाहिए. इस प्रकार यह सर्जिकल बायपास सर्जरी की आसानी से प्रतिस्थापित कर सकता है.जो अधिकांश हार्ट अस्पतालों में होती हैं.

 

इस उपचार का लाभ यह है. कि अस्पताल में किसी मरीज को ADMIT नहीं होना पड़ेगा.आपको अपने काम से कोई छुटी नहीं लेनी पड़ेगी.और शरीर पर कोई काट -पिट नहीं होंगी.तथा NATURAL बाईपास की लागत भी कम होती है. सर्जरी से भिन्न इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता हैं.

What does THE NATURAL BYPASS machine do?

आपको पता होना चाहिए. कि कोरोनरी धमनी के लिए रक्त का प्रवाह चरण के दौरान होता है. जब हृदय की मांसपेशियों को डायस्टोल कहा जाता है.सिस्टोल के दौरान रक्त जादातर धमनियों में प्रवेश नहीं कर सकता हैं.क्योंकी इस अवधि के दौरान हृदय की मांसपेशियों सिकोड़ना लगती हैं.जिससे रक्त का प्रवाह असंभव हों जाता हैं.

यह मशीन डिस्टोले के दौरान हृदय की मांसपेशियों को अधिक रक्त प्रदान करती है. इसमें कुछ दबाव प्रणालियां हैं जो शरीर के अंगों के आसपास लपेटी जाती हैं. जिनमें अतिरिक्त रक्त भंडारण होता है.

दबाव प्रणाली नियमित रूप से इस तरह से सिंक्रनाइज़ करती है.जिससे कि हृदय के हर डायस्टोले के दौरान कोरोनरी धमनियों की उत्पत्ति तक अधिक रक्त पहुंचता है.

इस प्रकार कोरोनरी धमनियों सफाई के दोरान रक्त के साथ पूरी तरह से भर जाती हैं. लेकिन लचीले लोचदार केशिकाओं में बहुत अधिक रक्त निस्तब्ध होकर वे चोडी हो जाती हैं.

दूसरे शब्दों में, यह मशीन 30 घंटों में मरीज की धमनियों को खोलता हैं.जो एथलीट की तुलना में काफी हैं.क्योंकी धमनियों को खोलने में खिलाडियों को 30 साल लग जाते हैं.इसलिए यह बाईपास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी से काफी बेहतर है.

Is this Natural Bypass accepted All over the world?

हां, इस मशीन ने पिछले बीस वर्षों में बहुत लोकप्रियता हासिल की है.USA में करीब 200 केंद्र इस मशीन का इस्तेमाल करते हैं. चीन में यह लगभग बाईपास सर्जरी और एंजियोप्लास्टी का स्थान ले चुका है.

चीन में करीब NATURAL बायपास के 10000 केंद्र हैं. जो हृदय रोगियों के लिए इस उपचार का उपयोग कर रहे हैं. भारत में, एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली, मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट जैसे अधिकांश बड़े अस्पतालों में मशीन उपलब्ध है. लेकिन भारतीय अस्पताल इस चिकित्सा को कम आकर्षक पाते हैं. और अब भी एंजियोप्लास्टी और बायपास सर्जरी को पसंद करते हैं. क्योंकि वे आर्थिक रूप से अधिक व्यवहार्य हैं.

 

  Source : Dr.Bimal chhajer